कौन हैं अमर्त्य सेन जिन्होंने भारत के मौजूदा हालात को ‘डरावना’ बताया!

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“मैं चाहता हूं कि देश एकजुट रहे, मैं ऐसे देश में विभाजन नहीं चाहता, जो ऐतिहासिक रुप से उदार था। हमें एक साथ मिलकर काम करना होगा।”

यह कहना है प्रसिद्ध अर्थशास्त्री और नोबेल पुरस्कार विजेता अमर्त्य सेन का। उनका कहना है कि देश की वर्तमान स्थिति ने उन्हें काफी डरा दिया है। अमर्त्य अनुसंधान केंद्र के उद्यघाटन के मौके पर सेन ने कहा कि, “अगर कोई मुझसे पूछे कि मैं किसी चीज़ से डरा हुआ हूं तो मेरा जवाब हां होगा। अब डरने की वजह है, देश के मौजूदा हालात डर की वजह बन गए हैं।”

उन्होंने न्यायपालिका और उसकी निष्क्रिय होती भूमिका की आलोचना करते हुआ कहा कि, ‘भारतीय न्यायपालिका अकसर विखंडन के खतरों की अनदेखी करती है जो डराने वाला है। एक सुरक्षित भविष्य के लिए न्यायपालिका, विधायिका और नौकरशाही के बीच संतुलन होना ज़रुरी है, जो देश में नदारद है। यह सामान्य बात नहीं है कि लोगों को जेलों में डालने के लिए औपनिवेशिक कानूनों का प्रयोग किया जा रहा है।’

भारतीय संस्कृति और संप्रभुत्ता की दुहाई देते हुए अमर्त्य सेन ने यह भी सलाह दी कि यह वक्त ऐसा है जब केवल सहिष्णुता से काम नहीं चलने वाला। उन्होंने कहा, ‘देश में सहिष्णुता की एक अंतनिर्हित संस्कृति है लेकिन समय की आवश्यकता है कि हिंदू और मुस्लिम एक साथ मिलकर काम करें।’

कौन हैं अमर्त्य सेन

दारा शिकोह, रविशंकर और अली अकबर खान की मिसाल देते हुए उन्होंने सामंजस्यपूर्ण संस्कृति पर चर्चा की। वह कहते हैं, शाहजहां के सबसे बड़े बेटे दारा शिकोह ने 50 उपनिषदों का मूल संस्कृत से फारसी में अनुवाद किया और इससे दुनिया को हिंदू धर्मग्रंधों, हिंदू संस्कृति और हिंदू परंपराओं के बारे में जानने में मदद मिली। रविशंकर और अली अकबर खान के राग और संगीत विभिन्न धर्मों के लोगों के साथ आने का सबूत है। आज भारत में ऐसे सहयोग की ज़रुरत है। यहां केवल सहिष्णुता की बात करने से समाज के बंटने के खतरों का समाधान नहीं होगा।

बता दें कि अमर्त्य सेन ने 1943 में बंगाल में आए खौफनाक अकाल को अपनी आंखों से देखा था। इस भीषण अकाल में बीस से 30 लाख लोग मौत के मुंह में समा गए थे। जिसका सेन पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ा और उन्होंने गरीबी व भूख जैसे विषयों पर उसी से प्रेरित होकर काफी काम किया। इन्हीं विषयों पर उनके किए गए काम के लिए उन्हें 1998 अर्थशास्त्र के नोबेल पुरस्कार से नवाज़ा गया। उसके बाद 1999 में भारत सरकार ने उन्हें भारत रत्न दिया।

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