क्या कभी देश में विपक्ष का राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार चुनाव जीता है?

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देश में राष्ट्रपति चुनाव की तारीखों का एलान हो चुका है। 18 जुलाई को उम्मीदवार चुनने के लिय वोटिंग की जाएगी। जल्द ही देश को उसका अगला राष्ट्रपति मिल जाएगा। राष्ट्रपति चुनावों में एनडीए के उम्मीदवार के खिलाफ विपक्ष अपना साझा उम्मीदवार उतारेगा। गोपाल कृष्ण गांधी और फारुख अब्दुल्ला सबसे आगे है। लेकिन एक सावल जो चर्चा का विषय है कि आख़िर विपक्ष का उम्मीदवार चुनाव क्यों नहीं जीत पाता?

चल रही ख़बरों के अनुसार, कहा जा रहा है कि अगर पूरा विपक्ष किसी एक नाम पर सहमति बना ले तो शायद इस बार विपक्ष को उसका राष्ट्रपति मिल जाए। आइये समझते हैं कि क्या विपक्ष ऐसा करने में कामयाब हो सकता है? आपने अक्सर सुना होगा कि देश में जिस पार्टी की सत्ता होती है तो राष्ट्रपति भी उसी का ही बनता है। आइये आपको बताते हैं कि कब सत्तापक्ष को राष्ट्रपति चुनाव में हार का सामना करना पड़ा है।

राष्ट्रपति चुनाव में क्या होता है वोट वैल्यू का मतलब ?

देश में राष्ट्रपति चुनाव में लगभग 4800 के आस-पास लोग हिस्सा लेते हैं। लेकिन जब वोटिंग के बाद इसका रिज़ल्ट गिना जाता है तब वोटों की संख्या लाखों में हो जाती है। अब आप सोचेंगे कि ऐसा कैसे हो सकता है ?  दरअसल राष्ट्रपति चुनाव में हर वोट की वैल्यू एक नहीं होती। इसमें हर राज्य के विधायकों और सांसदों की वोट वैल्यू अलग-अलग होती है। कैसे होती है काउंटिंग ? आइये समझते हैं।

राष्ट्रपति चुनाव में वोटिंग के बाद विधायक औ सांसद के वोट का मूल्य अलग-अलग तरीकों से निकाला जाता है। विधायक के वोट का मूल्य निकालने के लिय उस राज्य की कुल जनसंख्या का कुल विधायकों की संख्या से भाग दिया जाता है। फिर उस संख्या में 1000 का भाग किया जाता है। इसका जो नतीजा निकलेगा। वो विधायकत वोट वैल्यू होगा। इसी तरीक़े से सांसदों के वोट वैल्यू को निकाला जाता है।

देश में हर बार सत्तापक्ष का उम्मीवार राष्ट्रपति क्यों बनता है ?

इसका सबसे प्रमुख कारण है कि हमेशा सत्तापक्ष के पास अधिक वोट होता है। वे सब एकजुट हकर एक उम्मीदवार को चुनने के लिय वोट करते हैं। जबकि विपक्ष की पार्टियां अपने-अलग-अलग उम्मीदवार को चुनने में प्राथमिकता देती हैं। जिसके कारण वोट बंटता है और सत्तापक्ष को इसका सीधा फायदा पहुंचता है। इसमें सासंद की वोट वैल्यू अधिक होती है और साथ ही अगर सत्तापक्ष की सरकार राज्यों में भी अधिक है तो आसानी से सत्तापक्ष का उम्मीदवार जीत जाता है। बता दें कि यूपी के विधायकों की वोट वैल्यू अन्य राज्यों के विधायकों से ज़्यादा होती है। ऐसा इस लिय क्योंकि यूपी आबादी के लिहाज़ से देश का सबसे बड़ा राज्य है।

इस बार विपक्ष एकजुट होता नज़र आ रहा है। ममता बनर्जी की इस मीटिंग में 17 राजनीतिक दल के नेता शामिल हुए, और सभी ने एनडीए के उम्मीदवार के खिलाफ मज़बूत नेता को कैंडिडेट बनाने पर सहमति जताई। TMC, Congress, CPI, CPI(M), CPIML, RSP, Shiv Sena, NCP, RJD, SP, National Conference, PDP, JD(S), DMK, RLD, IUML and JMM – पार्टी इस मीटिंग में शामिल रही। मोदी सरकार के खिलाफ मोर्चा खोलने वाले टीआरएस ने अपना कोई प्रतिनिधि इस मीटिंग में नही भेजा न ही आम आदमी पार्टी से कोई इस मीटिंग में शामिल हुआ।

क्या कभी विपक्ष का उम्मीदवार राष्ट्रपति चुनाव जीता है

वैसे तो हमेशा सत्ता पक्ष का ही उम्मीदवार राष्ट्रपति बनता है लेकिन साल 1969 में विपक्ष का उम्मीदवार चुनाव जीत गया था। ऐसा इसलिए हुआ था क्योंकि सत्ता पक्ष के लोगों का वोट दो उम्मीदवारों में विभाजित हो गया था। इस बार माना जा रहा है कि अगर सारा विपक्ष एक उम्मीदवार के पक्ष में वोट कर दे और वोट विभाजित न हो तो विपक्ष अपना उम्मीदवार जिताने में कामयाब हो सकता है।

देश के चौथे राष्‍ट्रपति वीवी गिरी इसका अपवाद थे। 1969 में हुए राष्ट्रपति चुनाव में ये सत्‍ताधारी कांग्रेस के उम्मीदवार नीलम संजीव रेड्डी को पिछाड कर निर्दलीय राष्ट्रपति बने थे। हालांकि कांग्रेस में बटवारे और गुटबंदी के चलते इन्‍हें इंदिरा गांधी ने ही जिताया था।

लेकिन ऐसा विपक्ष का एकजुट होना मुश्किल दिखाई दे रहा है। माना जा रहा है कि विपक्ष की कुछ पार्टियां भाजपा का समर्थन कर सकती हैं। लेकिन फिर भी इस बार का मुकाबल दिलचस्प होता दिख रहा है।  भारत में अगले राष्ट्रपति पद का चुनाव जुलाई 18 को होना है जिसके नतीजे 21 जुलाई को घोषित होंगे।

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