देश की अदालतें बहुसंख्यक समाज के आगे ‘नतमस्तक’ क्यों..?

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Opinion : हमारे देश में जिस प्रकार का सांप्रदायिक माहौल तैयार किया जा रहा है। उसको नज़रअंदाज़ करने वालों को इसके परिणाम का अंदाज़ा नहीं है। इतिहास के पन्नों को पलट कर देखें तो मिलेगा कि जिन देशों में भी ऐसा माहौल तैयार किया गया, वहां धर्म,जाति,मज़हब के नाम पर लाशों से शहर पाट दिए गए। हम भी उसी पैटर्न को अपना रहे हैं। जिसकी शुरूआत का पहला क़दम ही ज़हरीले भाषण (Hate Speeches) हैं। जो हमारे देश में एक विशेष समुदाए के प्रति ‘थोक के भाव’ दिए जा रहे हैं।

Indian Judicial System : भारत में अदालत को सबसे अधिक भरोसे और उम्मीद की नज़रों से देखा जाता है। लेकिन वर्तमान समय देश के लोगों में अदालतों के प्रति भरोसा कम होता दिख रहा है, जो एक लोकतांत्रिक देश के लिय अच्छा संकेत नहीं है। यह कोई हवा में कही गई बात नहीं है। ऐसा देखा गया है कि पिछले कुछ वर्षों में देश की अदालतों द्वारा दिए गए फ़ैसले खुद ही न्याय के प्रति गंभीर सवाल खड़े करते रहे हैं। लोगों में अदालतों के प्रति (Indian Judicial System) निराशा देखी गई है।

ज्ञानवापी मस्जिद विवाद और अदालतें

हालही में ज्ञानवापी मस्जिद मामले में अदालतों की बेहद तीखी आलोचना जारी है। मुस्लिम समुदाए का सीधा आरोप है कि अदालतें सरकार के इशारे पर बहुसंख्य समाज को खुश करने का काम कर रही हैं। ज्ञानवापी मस्जिद पर अदालत का फैसला इसका साफ उदाहरण है। वाराणसी की सिविल जज सीनियर डिवीजन फास्ट ट्रैक कोर्ट ने ज्ञानवापी मस्जिद के पुरातात्विक सर्वेक्षण की मंजूरी देना ही जानबूझकर नए विवाद को जन्म देने का रास्ता था।

वाराणसी ज़िला अदालत ने ज्ञानवापी मस्जिद से जुड़े मामले में 12 सितंबर फैसला सुनाते हुए मुस्लिम पक्ष की सभी दलीलें ख़ारीज करते हुए हिंदू पक्ष के केस को सुनवाई के योग्य बताया। मुस्लिम पक्ष की ओर से पूजा स्थल कानून 1991 हवाले देते हुए हिंदू पक्ष के दावे को ख़ारिज करने की मांग की थी। लेकिन ज़िला अदालत ने इसको ये कहते हुए ख़ारिज कर दिया कि ये यहां पर लागू नहीं होता।

बनारस की ज़िला अदालत को इन हिंदू दावेदारों की अर्ज़ी सुनने के लिए सर्वोच्च न्यायालय ने ही कहा था। यह सब कुछ अदालतों ने आश्चर्यजनक फुर्ती से किया। वर्षों तक मस्जिद के साथ किसी हस्तक्षेप की कोशिश को रोकने वाले इलाहाबाद उच्च न्यायालय को इस बार सर्वेक्षण से कोई परेशानी न थी। न सिर्फ़ सर्वेक्षण आनन फ़ानन में किया गया बल्कि सर्वेक्षण टीम ने अदालत को रिपोर्ट करने के पहले बाहर अपनी खोज का ऐलान किया कि उसे मस्जिद में शिवलिंग मिल गया है।

AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने ज्ञानवापी पर अदालत के फैसला ग़लत बताया। उन्होंने कहा कि ये फैसला पूजा स्थल अधिनियम 1991 के ख़िलाफ़ है। ये फैसला देश में अस्थिर प्रभाव पैदा कर सकता है। ये फैसला भविष्य में ऐसे बहुत से मसलों को खोल देगा। साथ ही आम मुस्लमान भी इस फैसले से ख़ासा नाराज़ है। उनका कहना है कि बाबरी मस्जिद के वक्त कहा जाता था कि इसके बाद कोई मस्जिद का विवाद आगे नहीं आएगा। लेकिन अब देश में हर ऐतिहासिक मस्जिदों को लेकर अदालत की मदद से जबरन विवाद खड़ा किया जा रहा है।

बिलकिस बानो मामले में दोषियों को रिहाई

सामूहिक रेप और हत्या के मामले में गुजरात के गोधरा में उम्र कैद की सज़ा काट रहे 11 दोषियों को 15 अगस्त को रिहा किया जाना। ये सभी बिलकिस बानो से सामूहिक दुष्कर्म और उनके परिवार के सात लोगों की हत्या के मामले में सज़ा काट रहे थे।11 दोषियों में से दोषी ने एक राधेश्याम शाह ने सुप्रीम कोर्ट में सज़ा माफी के लिए याचिका दायर की।

कोर्ट ने गुजरात सरकार को याचिका पर फैसला लेने को कहा। इसके बाद गुजरात सरकार ने एक कमेटी गठित की थी। इस कमेटी ने माफी की याचिका मंजूर कर दी। इसके बाद सभी दोषी जेल से बाहर आ गए। उनका फूल मालाओं से स्वागत किया गया। मिठाई बांटी गई। ऐसा सम्मान किया गया जैसे कोई सैनिक जंग जीतकर बॉडर्र से लौटा हो।

अदालत का ऐसे दरिंदों को रिहा कर देना न्याय व्यवस्था को हिला देने जैसा है। गुजरात सरकार और सुप्रीम कोर्ट की इस फैसले के बाद दुनियाभर में जमकर आलोचना की गई। अदालत की साख पर तक गंभीर सवाल खड़े होने लगे। अदालत को एक विशेष समुदाए के रहम और नरम दिली दिखाने की बात कही गई। अदालते में अलग-अलग लोगों ने इस फैसले पर अदालत को दोबारा विचार करने को लेकर याचिकाएं डाली हैं। जिसपर गुनहगारों की रिहाई पर गुजरात सरकार को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।

नरसंहार के दोषी बाबू बजरंगी को ज़मानत

साल 2019 में इंसान की शक्ल में राक्षस बाबू बजरंगी को सुप्रीम कोर्ट का ज़मानत देना। साल 2002 में हुए गुजरात दंगों में दोषी बाबू बजरंगी को 2019 में सु्प्रीम कोर्ट ने जमानत दे दी थी। बाबू बजरंगी वो राक्षक है जिसने गुजरात दंगों के दौरान सैकड़ों औरतों और बच्चों को मौत के घाट उतारा और लोगों को ऐसा करने के लिय उकसाया था। ऐसे राक्षक को अदालत द्वारा रिहा कर दिया जाना अपने आप में हैरान करने वाला था।

ऐसे भी आरोप लगते रहे हैं कि देश की निचली अदालते हों या सुप्रीम कोर्ट। हर ओर मुस्लिम समुदाए के प्रति न्याय (Indian Judicial System) एक सवालिया निशान जैसा है। पिछले कुछ सालों में अदालतों द्वारा मुस्लिम समुदाए के लोगों के प्रति बदले की भावना जैसा माहौल देखा जाता रहा है। बुहसंख्यक समुदाए को बड़े से बड़े अपराध में झटपट ज़मानत और मुस्लिम समुदाए को सज़ा। उमर ख़ालिद, पत्रकार सिद्दीक कप्पन जैसे लोग इसका सटीक उदाहरण है।

अदालतें बहुसंख्क समाज के आगे ‘नतमस्तक’ क्यों?

बाबरी मस्जिद और रामजन्मभूमि फैसले के बाद से इस देश की सुप्रीम कोर्ट पर सवालिया निशान (Indian Judicial System) लगते रहे हैं। ज्ञानवापी मामले में ऐसा प्रतीत होता है कि सरकार के इशारे पर इस विवाद को अदालत की मदद से जबरन खड़ा किया गया। ज्ञानवापी का सर्वे और फिर मुस्लिम पक्ष की सारी दलीलों को ख़ारिज कर हिंदू पक्ष का केस सुनने योग्य करार दिया जाना इस ओर साफ इशारा करता है कि देश की अदालतें बहुसंख्क समाज के आगे ‘नतमस्तक’ हैं।

मुस्लिम समाज के पास थोड़ा बहुत जो भरोसा बचा है। वो इस देश की न्याय व्यवस्था पर ही है। लेकिन अदालतों के फैसले इस भरोसे को दिन-प्रति दिन कमज़ोर बना रही हैं। एक निराशा पैदा कर रही हैं। हर ओर से दबाया जा रहा मुस्लिम समुदाए अब अदालतों में पहुचने से पहले ही दोषी है। ऐसे आरोप लगते रहे हैं कि देश की अदालतों में एक विशेष समुदाए के जजों का कब्ज़ा है। पूरी न्याय व्यवस्था उनके ही हाथ में है। भारत में अदालतों का पतन इस देश में लोकतंत्र के पतन जैसा ही है।

कपिल सिब्बल बोले-अदालत से उठ रहा भरोसा

Indian Judicial System : देश के जाने-माने सीनियर ऐडवोकेट और राज्यसभा सांसद कपिल सिब्बल ने एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट की आलोचना करते हुए तीखा हमला बोला है। कपिल सिब्बल ने एक बेंच के सामने कहा कि अदालत से लोगों का भरोसा धीरे-धीरे उठ रहा है।

कपिल सिब्बल ने सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस अजय रस्तोगी और जस्टिस बी. वी, नागरत्ना की बेंच से कहा, ‘जिस कुर्सी पर आप बैठते हैं, उसके लिए हमारे मन में बहुत सम्मान है, यह एक ऐसी शादी है जिसे बार और बेंच के बीच नहीं तोड़ा जा सकता है। इसे अलग नहीं किया जा सकता। और जब हमें महसूस होता है कि क्या हो रहा है, कभी इस ओर से (बार) तो कभी उस ओर (बेंच) से तो ये मेरे जैसे शख्स को डिस्टर्ब करता है जो अपना पूरा जीवन इस कोर्ट को दे चुका हो।’

इससे पहले सिब्बल एक कार्यक्रम में कहा था, ‘मैंने यहां 50 साल प्रैक्टिस की है लेकिन अब यह कहने का वक्‍त आ गया है, अगर हम नहीं कहेंगे तो कौन कहेगा?’ देश के लोगों का अदालतों से भरोसा उठ रहा है।

Disclaimer : ये लेखक नेहाल रिज़वी के निजी विचार हैं। Ground Report ने इसको केवल पब्लिश किया है।

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