Rural Report: रेत के धोरों में जल की खोज

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Water in Sand Dunes|
बीकानेर | दिलीप बीदावत | वैसे तो राजस्थान के अलग-अलग क्षेत्रों में विविध प्रकार के पानी के पारंपरिक जल स्रोतों का निर्माण समुदाय द्वारा किया गया है. क्षेत्र की सतही एवं भूगर्भीय संरचना बरसात की मात्रा के अनुसार किस प्रकार के जल स्त्रोत बनाए जा सकते हैं, यह ज्ञान उस जमाने में भी लोगों को था जब शिक्षा और तकनीक आज की तरह विकसित नहीं हुई थी. बरसात की बूंदों को सतह पर संजोने के साथ-साथ भू-गर्भ में पीने योग्य जल कहां मिल सकता है और कैसे प्राप्त किया जा सकता है? इसका पता लगाने में कई पीढ़ियों का अनुभव रहा होगा. (Water in Sand Dunes) इसके अतिरिक्त सतही जल समाप्ति के बाद भू-गर्भ में प्रकृति द्वारा संजोये गये जल को ढूंढना और उपयोग कर जीवन को सतत चलाए रखने का भी अद्भुत अनुभव रहा होगा.

थार के रेगिस्तान में बेरियां, जिन्हें स्थानीय भाषा में कुंई भी कहते हैं, टिकाऊ पारंपरिक जल स्रोत रही हैं. जैसलमेर में बेरियों केे पानी को रेजाणी, बाड़मेर में सेजे का पानी तो अरावली में झारे का पानी कहते हैं. नाम अनेक परंतु पानी एक. ना पाताली न सतही, बल्कि बीच का पानी. (Water in Sand Dunes) बरसात के बाद भूमि एवं पहाड़ी चट्टानों द्वारा अवशोषित पानी भू-गर्भीय बहाव मार्गों से रिस्ता हुआ अवसादी चट्टानों के भराव वाले क्षेत्र में एकत्रित हो जाता है. रेजा, सेजा और झार इस रिसाव के ही नाम हैं जिससे पानी का नामकरण हुआ है. प्रकृति की रचना के आगे नतमस्तक होना चाहिए कि उसने थार के रेगिस्तान में जटिल, किंतु जीवन की अपार संभावनाओं से झोली भर रखी है. यह अलग बात है कि आधुनिक विकास और सुविधाओं की असीमित अपेक्षा इस झोली को तार-तार कर रही है. जमीन के नीचे कहीं जिप्सम, कहीं मुल्तानी मिट्टी, चूना पत्थर, तो कहीं अरावली की कठोर आग्नेय चट्टानों की परत बरसात के पानी को संजोने की कुदरती प्रक्रिया है. इन्हीं परतों परत के नीचे खारा पानी भी है. यह परत वर्षा जल को पाताल के खारे पानी में मिलने से रोकती है. (Water in Sand Dunes) जहां-जहां पर कठोर परत है वहां पर बेरियां अथवा कम गहराई वाले बेरे (खुले कुएं) हैं. भू-गर्भ में कहां मीठा जल है और कहां बेरी बेरे बन सकते हैं, यह ज्ञान प्राप्त करने में कई पीढ़ियां खपी हैं.

जैसलमेर से लगभग 40 किमी दूर सम पंचायत समिति के गांव सियांबर में रेत के धोरों के बीच सौ से अधिक बेरियां मौजूद हैं. लेकिन पानी की वैकल्पिक व्यवस्था होने के बाद देखभाल के अभाव में अधिकांश बेरियां रेत में दब गईं, लेकिन इसके बावजूद पांच बेरियां आज भी लोगों की प्यास बुझाती हैं. दूर तक ढालदार चट्टानी मगरे की समाप्ति के बाद पसरा है रेत का सागर. सियांबर के रेवंत राम मेघवाल ने बताया कि बेरियों (Water in Sand Dunes) की खोज पूर्वजों ने की थी. रेत के धोरों के बीच एक लंबी पट्टी में हरी-भरी वनस्पति को देखकर अंदाजा लगाया जा सकता है कि यहां पर रेजाणी पानी है. बेरियां खोदने का सिलसिला चला और सैकड़ों बेरियां बनी. सूखे की स्थिति में भी इन बेरियों में दो-तीन साल तक पीने लायक पानी मिल जाता है. अब बेरियां बनाने वाले कारीगर भी कम हैं और इसकी देखभाल करने वाले लोग भी नहीं हैं. (Water in Sand Dunes) पेयजल योजनाओं केे भरोसे देखभाल छोड़ दी गई है. अधिकांश बेरियां रेत में दफन हो चुकी हैं. लेकिन जिस प्रकार से मौसम चक्र बदल रहा है और सूखे की स्थिति गंभीर होती जा रही है, इसे देखते हुए समय आ गया है कि भावी पीढ़ियों के जीवन को बचाने के लिए बेरियों को फिर से जीवित करना होगा.

बेरियों की खोज और निर्माण में निपूर्ण होने में कई पीढ़ियों का अनुभव और ज्ञान है. सतही जल की समाप्ति के बाद रेगिस्तान में दूसरा विकल्प पाताली कुंए थे. कुंए भी मानव श्रम से बनते थे. कम से कम 100 फीट से अधिकतम 300 फीट तक की गहराई में पानी तक पहुंचने में कई दिनों से लेकर महीने लग जाते थे. सबसे कठिन काम था कठोर परतों को तोड़ना. दिन भर की मेहनत से कोई फुट-डेढ़ फुट की खुदाई हो पाती थी. रात में विश्राम के बाद प्रातः फिर से पत्थर तोड़ने का काम होता था. तब जाकर जमीन से पानी का रिसाव शुरू होता था और मिलता था पीने लायक पर्याप्त पानी. कालांतर में यहीं से बेरियां निर्माण का सिलसिला शुरू हुआ और रेत के समंदर के बीच एक के बाद एक हजारों की संख्या में बेरियां बनीं जो आज भी थार के लोगों की प्यास बुझाती है. सामूहिक जमीन पर व्यक्तिगत नाम से पुकारी जाने वाली बेरियों का उपयोग सार्वजनिक होता है. बनाने वाले के नाम से बेरी की पहचान होती है. पीढ़ी दर पीढ़ी गुज़रती गई लेकिन बेरी केे नाम से उनका स्मरण हो जाता है. बेरी बनाने वाला हिंदु है या मुसलमान, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है. (Water in Sand Dunes) उसके बनवाये बेरियों से सभी अपनी प्यास बुझाते चले आ रहे हैं. जैसलमेर के ही कुछड़ी गांव का सोढ़े खां आज भी बिना नाम और जाति पूछे बेरी से पानी निकाल कर सभी की प्यास बुझाते हैं. दिन भर में सैकड़ों पशुओं की प्यास इन्हीं की बेरियों से बुझती है. वास्तव में दो धर्मों की मिश्रित संस्कृति की मिसाल है, रेगिस्तान की यह बेरियां.

जैसलमेर जिले की रामगढ़ तहसील का हेमा गांव बेरियों के कारण पेयजल के लिए आत्मनिर्भर है. इस क्षेत्र की बेरियों के पुनरुद्धार के काम में लगे चतर सिंह जाम बताते हैं कि जैसलमेर के भू-गर्भ में मुल्तानी मिट्टी की परत है. मगरों से रिसाव होकर वर्षा का पानी मुल्तानी मिट्टी पर रुक जाता है. मोटे कण वाले रेत के धोरे (Water in Sand Dunes) इस पानी की सुरक्षा करते हैं. गर्मी में वाष्पीकरण नहीं होने देते हैं. भयंकर सूखे के दौरान भी बेरियों से पीने लायक पानी मिल जाता है. हमने इस क्षेत्र में ग्रामीणों के सहयोग सेे सैकड़ों बेरियों का जीर्णोद्धार कराया है. इसका निर्माण करना अपने आप में एक अनूठा हुनर है. खुदाई और कच्ची धंसने वाली रेत को रोकने के लिए सूखे पत्थरों से चिनाई व कठोर परत को तोड़ कर बेरी बनाना सभी के बस की बात नहीं है. ऊपर से चिनाई करते हुए नीचे जाना होता है. जिसके बाद बेरी का व्यास दो से अढ़ाई फ़ीट रहता है. खुदाई करने वाला व्यक्ति घुटनों के बल बैठकर अंदर घूम सकता है. पच्चीस-तीस फ़ीट केे बाद कठोर परत आती है जिसे तोड़ने में भारी मशक्कत करनी पड़ती है. छोटे औजार से ठक-ठक कर दिनभर में एकाध फ़ीट खुदाई होती है.

संकरे व्यास के कारण जोर भी नहीं लगता, वहीं ऑक्ससीजन की कमी के कारण थोड़ी देर खुदाई के बाद बाहर आना पड़ता है. खुदाई में दो व्यक्तियों की जोड़ी होती है जो बारी-बारी से खुदाई करते हैं. बाहर कुछ लोग मिट्टी से भरा बर्तन बाहर निकालने के लिए खड़े रहते हैं. जितनी ज़्यादा मेहनत है उतनी ही ज़्यादा जान का जोखिम भी है. कई बार मिट्टी के धंसने का भी खतरा रहता है. लेकिन रेगिस्तान में जीवन बचाने के लिए जोखिम उठाना यहां के लोगों की आदत में शुमार है. चतर सिंह जाम बताते हैं कि अब बेरियां बनाने वाले कारीगर बहुत कम हैं. (Water in Sand Dunes) नई पीढ़ी ने यह हुनर नहीं सीखा. बेरी से प्रति वर्ष मिट्टी निकाल कर उसे उपयोगी बनाने वाले भी नहीं है.

जैसलमेर का हाबुर गांव चमत्कारी पत्थर के लिए प्रसिद्ध है. (Water in Sand Dunes) कहा जाता है कि यहां के पत्थर से दही जम जाता है. लेकिन यहां की बेरियां भी कम प्रसिद्ध नहीं हैं. गांव के लोगों ने संकटकाल में उपयोग के लिए कुछ बेरियों को बचा रखा है. जहां पर बेरियों का समूह है वह गांव का तांडा (पशुओं के पानी पीने और विश्राम का स्थान) कहलाता है. जैसलमेर में पशुओं की संख्या इंसानों से कई गुना ज्यादा है और उनके पानी की आपूर्ति इन्हीं बेरियों से होती है. बाड़मेर, जैसलमेर व बीकानेर के सीमांत क्षेत्र के गांवों में आज भी पेयजल का मुख्य साधन बेरियां हैं. बीकानेर, जैसलमेर और बाड़मेर के महा-मरूस्थल में बेरियां ही पानी का प्रमुख साधन थी जिसके सहारे सदियों से लोग जीवन यापन करते आए हैं. इन बेरियों को आज सुरक्षा, संरक्षण और पुनर्जीवन दान की जरूरत है. पर्यटकों के लिए जहां यह आकर्षण का केंद्र बन सकती है वहीं गांव के लोगों के लिए भीषण पेयजल संकट के समय संकटमोचक साबित होगी. (चरखा फीचर)

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