Shankaracharya Swami Swaroopanand Saraswati: वो क्रांतिकारी स्वतंत्रता सैनानी शंकराचार्य जिन्होंने अंग्रेजों को देश से खदेड़ने में निभाई अहम भूमिका

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शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती (shankaracharya swami swaroopanand saraswati) का मध्य प्रदेश के नरसिंहपुर जिले स्थित आश्रम में दोपहर करीब साढ़े तीन बजे निधन हो गया है. नौ दिन पहले ही उन्होंने (shankaracharya swami swaroopanand saraswati) आश्रम में अपना 99वां जन्मदिन मनाया था. शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती का जन्म 2 सिंतबर 1924 को मध्य प्रदेश के सिवनी जिले स्थित दिघोरी गांव में हुआ था. वर्ष 1981 में पहली बार स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती को शंकराचार्य की उपाधि मिली. वे वर्तमान में द्वारका और ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य थे.

धर्म के मार्ग के लिए महज 9 वर्ष की उम्र में शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती ने अपना घर त्याग दिया था. उनकी रुचि न सिर्फ धार्मिक बल्कि सामाजिक कार्यों में भी रही. एक संत होने के साथ-साथ शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती एक स्वतंत्रता सेनानी भी रहे औरर भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान उन्होंने अंग्रेजों को देश से खदेड़ने में अहम भूमिका निभाई थी. यही कारण रहा कि उन्हें एक क्रांतिकारी साधु समझा जाता था.

शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती कांग्रेस नेताओं के साथ नजदीकियों के चलते चर्चा में भी रहे. हाल ही में कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी वाड्रा ने उनसे मुलाकात की थी. वे पिछले लंबे वक्त से बीमार चल रहे थे. मध्य् प्रदेश के कई बड़े नेता शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती को अपना गुरू मानते आए हैं.

बता दें कि धार्मिक क्रियाकलापों के चलते वे काशी पहुंचे और स्वामी करपात्री महाराज से वेद-वेदांग और शास्त्रों की शिक्षा ली और इसके बाद उन्होंने अपनी आगे धार्मिक और सामाजिक यात्राएं की. आजादी की लड़ाई से अहम योगदान निभाने वाले शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती 1950 में दंडी संन्यासी बन गए थे. इसके लिए उन्होंने शारदा पीठ शंकराचार्य स्वामी ब्रह्मानंद सरस्वती से दंड-संन्यास की दीक्षा ली थी और इसके बाद से उन्हें स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के नाम से जाने जाने लगा था.

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