महाराष्ट्र : क्या है दल बदल कानून और ये कैसे काम करता है ?

Spread the love

दल बदल कानून : महाराष्‍ट्र की राजनीति में अचानक से आए तूफान ने सियासत का रुख ही मोड़ दिया है। महाराष्ट्र सरकार में कैबिनेट मंत्री एकनाथ शिंदे ने उद्धव ठाकरे को सत्ता के बेदखल कर उनसे शिवशेना की कमान भी छीन लेने का प्रयास कर रहे हैं। वो दावा कर रहे हैं कि 50 से अधिक विधायक उनके साथ हैं। अब सबसे बड़ा सवाल जो यह है कि क्या ये विधायक पाला बदलेंगे या फिर बीजेपी के खेमे में जाकर सत्ता परिवर्तन कर देंगे?

महाराष्ट्र में इस सियासी संग्राम के बीच एक सवाल उठ रहा है कि अगर ऐसा होता है तो शिवसेना विधानसभा स्‍पीकर के पास जाकर इन विधायकों को दल-बदल कानून के तहत ‘अयोग्‍य’ करार देने की मांग कर सकती है। फिलहाल मौजूदा हालात को देखते हुए साफ कहा जा सकता है कि उद्धव ठाकरे के हाथ से सत्ता निकलती दिख रही है। आइए आपको बताते हैं कि दल-बदल कानून क्‍या है और किन परिस्थितियों में लागू होता है।

क्या होता है दल-बदल कानून ?

दल-बदल कानून की मदद से उन विधायकों/सांसदों को दंडित किया जाता है जो एक पार्टी छोड़कर दूसरी पार्टी में चले जाते हैं। वहीं इस दल-बदल कानून में सांसदों/विधायकों के समूह को दल-बदल की सजा के दायरे में आए बिना दूसरे दल में शामिल हो सकते हैं। 1967 के आम चुनाव के बाद विधायकों के पार्टी बदलकर इधर-उधर जाने से कई राज्‍यों की सरकारें गिर गईं। ऐसा बार-बार होने से रोकने के लिए दल-बदल कानून लाया गया। संसद ने 1985 में संविधान की दसवीं अनुसूची में इसे जगह दी।

विधायिका के पीठासीन अधिकारी (स्‍पीकर, चेयरमैन) ऐसे मामलों में फैसला करते हैं। सुप्रीम कोर्ट के अनुसार, इनके फैसलों को उच्‍च अदालतों में चुनौती दी जा सकती है। कानून के तहत तीन स्थितियां हैं। इनमें से किसी भी स्थिति में कानून का उल्‍लंघन सदस्‍य को भारी पड़ सकता है।

दल बदल कानून के तहत क्या सज़ा मिलती है

नामित जनप्रतिनिधियों से संबंधित। कानून के अनुसार, अगर वे नियुक्ति के छह महीनों के भीतर किसी दल में शामिल हो सकते हैं, उसके बाद नहीं। एक पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ने वाला ‘स्‍वेच्‍छा से’ उस पार्टी की सदस्‍यता छोड़ दे या विधायिका में पार्टी की इच्‍छा के खिलाफ वोट करे। निर्दलीय चुने गए सांसद/विधायक अगर बाद में किसी पार्टी की सदस्‍यता ले लें।

अगर स्‍पीकर/चेयरमैन जनप्रतिनिधि को अयोग्‍य करार दें तो वह उस सत्र के दौरान चुनाव नहीं लड़ सकता। अगले सत्र में वह उम्‍मीदवार हो सकता है। ‘अयोग्‍य’ करार दिए गए किसी भी सदस्‍य को कार्यकाल पूरा होने तक मंत्री नहीं बनाया जा सकता।

अगर बागी विधायक पाला बदलकर बीजेपी के खेमे की ओर रुख करेंगे। तो शिवसेना विधानसभा स्‍पीकर के पास जाकर इन विधायकों को दल-बदल कानून के तहत ‘अयोग्‍य’ करार देने की मांग कर सकती है। लेकिन एकनाथ शिंदे ने खुद कहा कि वो शिवसेना नहीं छोड़ रहे हैं। पार्टी के अन्य विधायक भी शिवसेना का साथ नहीं छोड़ रहे। तब ऐसे में आने वाले वक्त में स्थिति और साफ हो सकेगा।

Ground Report के साथ फेसबुकट्विटर और वॉट्सएप के माध्यम से जुड़ सकते हैं और अपनी राय हमें Greport2018@Gmail.Com पर मेल कर सकते हैं।

Leave a Comment