देश में ग़रीबों की अपेक्षा अमीर लोग अच्छे शिक्षण संस्थानों में एडमिशन लेने में अधिक सक्षम क्यों ?

Spread the love

भारत में हर साल लाखों छात्र अलग अलग तरह के एंट्रेंस टेस्ट देत हैं, जेईई, कैट, मैट, क्लैट, नैट, नीट, यूपीएसी और न जाने क्या-क्या। ग्रैजुएशन से लेकर डॉक्ट्रेट तक बच्चा तमाम एग्ज़ाम्स की तैयारी करता है। बिना कोचिंग के इन एंट्रेंस टेस्ट को पास करना लगभग नामुमकिन बना दिया गया है। भारत में कोचिंग का धंधा अरबों रुपए का हो चुका है।

एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में कई टेस्ट प्रिपरेशन सर्विस प्रोवाईडर जैसे करियर लॉंचर और करियर पाईंट का 60 मिलियन डॉलर का कारोबार हो चुका है। इकॉनॉमिक एंड पॉलिटिकल वीकली के रिसर्च रिपोर्ट के मुताबिक देश में हायर एज्यूकेशन एक ट्रेडेबल कमॉडिटी बन चुका है। जो समाज में मौजूद सामाजिक आर्थिक असमानता को और ज्यादा बढ़ा रही है।

एमएचआरडी 2016 की रिपोर्ट के मुताबिक गरीबों की अपेक्षा अमीर लोग देश के अच्छे संस्थानों में एडमिशन लेने में ज्यादा सक्षम हैं, क्योंकि वो अपने बच्चों की कोचिंग पर पैसा खर्च कर सकते हैं। साल 2012 की रिपोर्ट के मुताबिक हर वर्ष सालाना पारिवारिक आय 4.5 लाख से ज्यादा वाले 10.3 फीसदी बच्चें आईआईटी एंट्रेंस पास कर पाते हैं तो 1 लाख से कम पारिवारिक आय वाले केवल 2.6 फीसदी बच्चे ही जेईई क्रैक कर पाते हैं।

यानि जिन छात्रों की आर्थिक स्थिति बेहतर होती हैं उन्हें इन एग्ज़ाम्स को क्रैक करने में एक एडवांटेज होता है, क्योंकि वो कोचिंग पर पैसा खर्च कर पाते हैं, अच्छे बोर्ड और महंगे स्कूल से पढ़ाई कर पाते हैं। यह सब भारत में अच्छी उच्च शिक्षा पाने के लिए ज़रुरी है लेकिन देश का एक बड़ा तबका इन सुविधाओं सें वंचित है। बस इसलिए की उसकी हैसियत नहीं है और सिस्टम ऐसा है कि जैसी हैसियत वैसी शिक्षा।

और तो और जेईई क्वालीफाई करने वाले ज्यादातर छात्र बड़े शहरों से आते हैं, यानि देश की एक बहुत बड़ी आबादी जो गांवों और कस्बों में बसती है वो भेदभावपूर्ण शिक्षा व्यवस्था में पीछे छूटती जा रही है।

आईआईटी में लो इनकम कैटेगरी वाले छात्रों का सक्सेस रेट 14-16 फीसदी होता है, मिडिल इनकम वालों का 27 फीसदी और हाई इनकम ग्रुप का सक्सेस रेट 38-39 फीसदी तक होता है।

जनरल कैटेगरी के सालाना 4 लाख से ज्यादा पारिवारिक आय वाले बच्चों का सक्सेस रेट 81 फीसदी है तो 1 लाख से कम वालों का 38 फीसदी। ज्यादातर सफल छात्रों को स्कूल बोर्ड भी सीबीएसई ही होता है। एंट्रेंस टेस्ट को इस तरह डिज़ाईन किया जा रहा है जिससे इन्हें बिना कोचिंग के क्रैक करना आसान नहीं है।

पहले देश की सेंट्रल यूनिवर्सिटी में एडमिशन मैरिट बेसिस पर होता था, स्टेट बोर्ड से पढकर भी बच्चा देश की प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटी में एडमिशन ले पाता था। लेकिन अब सरकार ने इसमें भी सीयूईटी यानि कॉमन युनिवर्सिटी एंट्रेंस टेस्ट के ज़िरए एडमिशन शुरु कर दिया है। इसमें एनसीआरटी के सिलेबस के आधार पर सवाल पूछे जाते हैं जो देश के ज्यादातर सीबीएसी स्कूलों में ही लागू होता है।

अगर देश की प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटीज़ में पढ़ने के लिए सीबीएई वालों को ही प्राथमिकता देनी है तो स्टेट बोर्ड्स खत्म क्यों नहीं कर देते।क्यों नहीं पूरे देश में एनसीआरटी का ही सिलेबस लागू किया जाना चाहिए।

यूजीसी का कहना है कि अलग-अलग स्टेट बोर्ड्स का मूल्यांकन का तरीका अलग होता है, ऐसे में मैरिट बेसिस पर एडमिशन देना सही तरीका नहीं है।इस बात में दम भी है, लेकिन क्या एंट्रेंस टेस्ट लाने से असमानता खत्म हो गई? भारत सरकार जड़ों में पानी डालने की जगह पत्तियों को पानी से नहला रही है।
क्या पहले ज़मीनी स्तर पर सभी स्टेट बोर्ड में एक जैसी पढ़ाई हो इसकी व्यवस्था नहीं की जानी चाहिए थी। पहले 12 वी में अच्छे अंक लाकर भोपाल, पटना, जयपुर, शिमला, रायपुर जैसे छोटे शहरों के बच्चे भी डीयू में एडमिशन ले पाते थे, अब उन्हें भी एंट्रेंस की तैयारी करनी होगी। अगर उन्होंने स्टेट बोर्ड से पढ़ाई की होगी तो शायद ड्रॉप लेकर पहले कोचिंग करनी पड़े।

अगर देश में बिना कोचिंग के कुछ नहीं होना है तो क्यों नहीं सरकार ऐसी कोचिंग क्लासेस चलाती जिनमें गरीब छात्रों को कम पैसों में बढिया तैयारी करवा सके।

यूपीएससी 2021 की टॉपर रही श्रुति शर्मा जामिया के कोचिंग संस्थान से पढ़ी। यह कोचिंग गरीब तबके के बच्चों के लिए ही यूजीसी द्वारा शुरु की गई है। ऐसी कुछ कोचिंग्स दूसरी सेंट्रल यूनिवर्सिटी में भी यूजीसी ने शुरु की है। लेकिन ऐसी व्यवस्था हर जगह नहीं है। ज़रुरत है कि इस तरह के कोचिंग संस्थान हर जगह खोले जाएँ ताकि आर्थिक और सामाजिक रुप से कमजोर तबके के योग्य छात्रों को भी समान अवसर मिल सके।

Ground Report Hindi के साथ फेसबुकट्विटरकू ऐपवॉट्सएप और इंस्टाग्राम माध्यम से जुड़ सकते हैं और अपनी राय हमें Greport2018@Gmail.Com पर मेल कर सकते हैं।

Leave a Comment