Eid-ul-Azha 2022 : मुस्लमान बकरीद पर जानवर क्यों काटते हैं, जानिए क्या है कुर्बानी का इतिहास ?

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Why do Muslims slaughter animals on Bakrid? : दुनियाभर में जहां-जहां इस्लाम को मानने वाले लोग रहते हैं। वो लोग ईद-उल-अज़हा( Eid al-Azha) यानि बकरीद के मौक़े पर अलग-अलग जानवरों की कुर्बानी देते हैं। मुस्लमान इस त्योहार पर केवल उन्ही जानवरों की कुर्बानी देते हैं जिन जानवरों को इस्लाम में हलाल बताया गया। केवल वही जानवर जिनको (ज़िब्हा) कुर्बानी के बाद खाया जा सके। इस पर्व को मुस्लमान ईद-ए-कुर्बां भी कहते हैं। अरबी महीना ज़िलहिज्जा की 10, 11, 12 को पूरी दुनिया के मुस्लमान इस पर्व मनाते हैं।

पूरी इस्लामी तारीख़ में 1 लाख 24 हज़ार पैग़ंबर ( Prophet) रहे हैं। इन सभी ने अपने-अपने दौर में इस्लाम को फैलाया और लोगों को अल्लाह के हुक्म का पालन करने का पैग़ाम दिया। इस्लामी तारीख़ में आख़री पैगंबर मोहम्मद साहब हैं। इसके बाद कोई पैगंबर नहीं हुआ। इन्हीं पैगंबरों में से एक पैगंबर इब्राहीम हैं। बकरीद का त्योहार इनकी ही सुन्नत (जिस कार्य को करना  पुण्य हो) है।

मुस्लमान बकरीद पर जानवरों की कुर्बानी क्यों देते हैं ?

Why do Muslims slaughter animals on Bakrid ?

मुस्लमानों की पवित्र किताब क़ुरआन में लिखा है-एक बार पैगंबर इब्राहीम का अल्लाह ने इम्तिहान लिया। उन्होंने हज़रत इब्राहीम को ख्वाब में अपनी सबसे प्यारी चीज़ को अल्लाह की राह में कुर्बान करने का हुक्म दिया। इस ख़्वाब के बाद हज़रत इब्राहीम सोच में पड़ गए। वो अल्लाह का हुक्म किसी भी सूरत में टाल नहीं सकते थे। उनके बेटे का नाम इस्माइल था। जिसको वो बहुत प्यार करते थे।

अपने सबसे प्यारे बेटे इस्माइल की कुर्बानी देने को लेकर पैगंबर इब्राहिम चिंतित थे। लेकिन वो अल्लाह के हुक्म को टाल नहीं सकते थे। उन्हें अपने बेटे को आल्लाह की राह में कुर्बान करना ही था। आख़िरकार वो अपने बेटे की कुर्बानी देने के लिय तैयार हो जाते हैं। बेटे की गर्दन को काटना किसी बाप के लिय बेहद सख्त काम है। बेटे की कुर्बानी के समय हाथ न कांपे इस लिय उन्होंने अपनी आंख पर पट्टी बांध ली। ताकि उनके जज़्बात उनको ऐसा करने से रोक न सकें।

जैसे ही उन्होंने बेटे की गर्दन पर छूरी फेरी और इसके बाद आंख की पट्टी हटाई तो पाया कि बेटे के स्थान पर एक दुम्बा है। कुरआन के अनुसार, अल्लाह द्वारा लिए गए इस सख्त इम्तिहान में पैगंबर इब्राहीम खरे उतरते हैं। अल्लाह उनसे खुश होकर आसमान से एक दुम्बा भेज देता है और हज़रत इस्माइल बच जाते हैं। यहीं बकरीद के पर्व की शुरूआत हुई और सभी मुसलमान हज़रत इब्राहिम की इस सुन्नत को ज़िंदा रखने के लिए अल्लाह की राह में कुर्बानी देते हैं।

कुर्बानी का गोश्त ग़रीबों में बांटते हैं मुस्लमान

इस्लाम में मुस्लमान को हिदायत (सलाह) दी गई है कि हर मौक़े पर वे ग़रीबों का सबसे पहले ख़्याल रखें। अगर कोई ग़रीब है तो अमीर मुस्लमान को उसकी मदद को तुरंत आगे आना चाहिए।  बकरीद पर गरीबों का खास ख्याल रखा जाता है।  

जिस जानवर की कुर्बानी दी जाती है उसके गोश्त के तीन हिस्से किए जाते हैं। एक हिस्सा पड़ोसियों और रिश्तेदारों को बांटा जाता है। दूसरा हिस्सा ग़रीबों को बांटा जाता है। इन तीन हिस्सों में खुद के लिए एक हिस्सा रखना होता है। मुस्लमान जिस जानवर की कुर्बानी देता है। उसकी उम्र कम से कम 12 महीने यानी एक साल होनी ज़रूरी है। वहीं अगर बड़ा जानवर हैं तो उसकी उम्र कम से कम 2 साल होना चाहिए।

मुस्लमान किन जानवरों की कुर्बानी देते हैं ?

Which animals do Muslims sacrifice?

मुस्लमान केवल उन जानवरों की कुर्बानी कर सकता है जिनको इस्लाम में जायज़ (खाने योग्य) कहा गया है। जिसको हलाल जानवर कहते हैं। कुछ जानवर ऐसे हैं जिनपर कुर्बानी नहीं दे सकते। लेकिन उनको खाया जा सकता है। वे जानवर हराम नहीं हैं उनको खाया जा सकता है लेकिन कुर्बानी नहीं कर सकते। जैसे- मछली, कबूतर, बकरी,तितर, मुर्गी, मुर्गा, छोटा पंछी, आदि। इनको खाया जा सकता है लेकिन कुर्बानी नहीं दे सकते। भारत में आमतौर पर बकरा,भैंस,भेड़ जैसे जानवरों पर कुर्बानी देते हैं। ऊंट-गाय पर भी कुर्बानी होती है लेकिन भारत में ऊट और गाए की कुर्बानी बैन है।

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