Eco-Sensitive Zones: सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के खिलाफ क्यों विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं केरल के किसान?

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Why farmers in Kerala protesting against Eco-Sensitive Zones?: सुप्रीम कोर्ट ने हाली ही में ऑर्डर दिया था कि सभी प्रोटेक्टेड एरिया. वाईल्ड लाईफ सैंक्चुरी और नैशनल पार्क के एक किलोमीटर के दायरे में इको सेंसिटिव ज़ोन बनाए जाएं। ((Why farmers in Kerala protesting against Eco-Sensitive Zones?)) भारत सरकार के वाईल्ड लाईफ एक्शन प्लान 2002-2016 के मुताबिक नैशनल पार्क, सैंक्चुरी के आसपास के 10 किलोमीटर एरीया को ईको फ्रैजाईल ज़ोन या ईको सैंसिटिव ज़ोन घोषित करने की बात कही गई है। दक्षिणी राज्य जैसे केरल और कर्नाटक के किसान ईको सेंसिटिव ज़ोन का विरोध कर रहे हैं। उन्हें लगता है कि इससे उनकी लाईवलीहुड खतरे में पड़ जाएगी। (Why farmers in Kerala protesting against Eco-Sensitive Zones?)

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केरल के Idukki, Kottayam, Pathanamthitta and Wayanad जिलों में किसानों को डर है कि ईको सेंसिटिव ज़ोन से उन्हें खेती करने करने में परेशानी होगी और उनकी जीविका को इससे खतरा पैदा हो जाएगा, इसीलिए ये किसान सुप्रीम कोर्ट के ऑर्डर का विरोध कर रहे हैं। राज्य सरकार, विपक्षी पार्टियां और कैथलिक चर्च भी इन किसानों का समर्थन कर रहे हैं। विरोध बढ़ता देख केंद्र सरकार ने कहा है कि वो राज्य सरकार के साथ बात करके इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में एफीडेविट दायर करेगी।

क्या होते हैं इको सैंसिटिव ज़ोन?/What are Eco-Sensitive Zones?

नैशनल वाईल्ड लाईफ एक्शन प्लान 2002-2016 के मुताबिक इकॉलॉजिकल इंपॉर्टेंस वाले एरियास के 10 किलोमीटर के दायरे को ईको सेंसिटवि ज़ोन घोषित किया जाता है। जिससे यहां किसी भी तरह कि कमर्शियल एक्टीविटी न हो सके। इसका दायरा ज़रुरत और महत्व के हिसाब से 10 किलोमीटर से और आगे बढ़ाया जा सकता है। केंद्र सरकार पर्यावरण की दृष्टी से महत्वपूर्ण जगहों को ESZs ईको सेंसिटिव ज़ोन घोषित कर सकती है।

पर्यावरण मंत्रालय की गाईडलाईन्स के मुताबिक ईको सेंसिटिव ज़ोन प्रोटेक्टेड एरिया के लिए शॉक एब्ज़ॉर्बर की तरह काम करते हैं। ये प्रोटेक्टेड एरिया को आसपास होने वाली मानवीय गतिविधियों के दुष्परिणाम से बचाने का काम करते हैं।

ईको सेंसिटिव ज़ोन में माईनिंग, पेड़ों की कटाई, और कोई भी कमर्शियल एक्टीविटी पर बैन होता है। हालांकि इसका उद्देश्य लोगों की दैनिक गतिविधियों को बाधित करना नहीं है।

इन जगहों पर खेती करने, रेन वॉटर हार्वेस्टिंग, ऑर्गेनिक फार्मिंग, हॉर्टीकल्चर जैसी गतिविधियों पर पाबंदी नहीं होती।

इको सेंसिटिव ज़ोन का उद्देश्य इन क्षेत्रों के पर्यावरण को सुरक्षित रखना मात्र है।

क्या है सुप्रीम कोर्ट का ऑर्डर?

जून 3 को सुप्रीम कोर्ट की 3 जज की बेंच ने एक पीआईएल को सुनते हुए तमिलनाडू के नीलगिरी के आसपास के फॉरेस्ट लैंड को बचाने के लिए ईको सेंसिटिव ज़ोन बनाने का आदेश दिया था जिसे बाद में पूरे देश में लागू करने का आदेश जारी कर दिया गया।

सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने 2011 की केंद्र सरकार की गाईडलाईन को सही मानते हुए पूरे देश में प्रोटेक्टेड एरिया के 1 किलोमीटर के एरिया की बाउंडरी निर्धारित कर इसे इको सेंसिटिव ज़ोन घोषित करने को कहा। इसमें यह भी कहा गया कि किसी भी ईको सेंसिटिव ज़ोन में पर्मानेंट कंस्ट्रक्शन और माईनिंग पर प्रतिबंध रहेगा। साथ ही अगर ज़रुरत हो तो इसका दायरा 1 किलोमीटर से अधिक बढ़ाया जा सकता है।

किसानों को ईको सेंसिटिव ज़ोन से क्या दिक्कत है?

दरअसल दक्षिणी राज्य जैसे केरल और तमिलनाडू में प्रोटेक्टेड एरिया के आसपास काफी लोग रहते हैं। यहां ह्यूमन सेटलमेंट काफी डेंस है। किसानों का कहना है कि इससे उनकी जीविका पर असर पड़ेगा। केरल में 8 लाख एकड़ ज़मीन वाईल्ड लाईफ सैंक्चुरी के अंतर्गत आती है। अगर 1 किलोमीटर और ईको सेंसिटिव घोषित कर दिया गया तो इसमें कुल 4 लाख एकड़ ऐसा एरिया है जहां लोग रहते हैं और खेती करते हैं। यहां पर कमर्शियल एक्टीविटी बंद होने से उनका जीवन प्रभावित होगा।

सुप्रीम कोर्ट के जजमेंट के पहले केरल सरकार ने यह मांग की थी कि ईको सेंसिटिव बफर ज़ोन में ह्यूमन सेटलमेंट को एक्सक्लूड किया जाना चाहिए। ऑर्डर आने के बाद केरल सरकार और विपक्ष दोनों ही किसानों की मांग का समर्थन कर रहे हैं और स्ट्राईक कर रहे हैं।

हालांकि इस ऑर्डर में यह कहा गया है कि ईको सेंसिटिव ज़ोन में खेती किसानी पर रोक नहीं है। फिर भी विरोध हो रहा है।

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