वर्षा से मातोश्री लौट चुके उद्धव क्या शिवसेना को संजोने में कामयाब हो सकेंगे ?

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मराठा साम्राज्य की नींव रखने वाले राजा छत्रपति शिवाजी महाराज के नाम पर बनी शिवसेना के राजनीतिक करियर पर प्रश्नचिन्ह लग गया है। ढाई साल एनसीपी के साथ मिलकर सरकार चलाने के बाद शिवसेना को राज्य में अपनी सरकार गंवानी पड़ गई और अब पार्टी के ही बागी विधायकों के दम पर बीजेपी ने राज्य में सरकार बना ली और शिवसेना के ही विधायक एकनाथ शिंदे मुख्यमंत्री बन गए।

अब सियासी गलियारों में इस पर तरह-तरह की प्रतिक्रियाएं आ रहीं है और लोग अपना-अपना विश्लेषण पेश कर रहे हैं। कोई इसे शिवसेना के राजनीतिक करियर की समाप्ति मान रहा है तो किसी का अनुमान है कि अब एक बार फिर से शिवसेना बीजेपी के साथ मिल जाएगी। आइए जानते हैं शिवसेना से जुड़ीं कुछ ज़रूरी जानकारियां।

बाला साहेब ठाकरे ने कब और क्यों बनाई ?

मुंबई के शिवाजी पार्क में 19 जून 1966 को बाला साहेब ठाकरे ने डरते-डरते एक मीटिंग बुलाई। उनका डर यह था कि कहीं उनके बुलाने पर उम्मीद के मुताबिक लोग जमा नहीं हो पाएं तो फिर किरकिरी हो जाएगी। ख़ैर मीटिंग में पचास हज़ार लोगों के बैठने की व्यवस्था की गई। और जब मीटिंग की शुरुआत हुई उस समय वहां पर 2 लाख लोग जमा हो चुके थे। इन दो लाख लोगों के बीच बाल ठाकरे ने नारियल फोड़कर शिवसेना पार्टी की बुनियाद डाली। पार्टी की स्थापना करते वक्त उन्होंने अपने भाषण में कहा ता कि यह पार्टी हमेशा मराठी अस्मिता की लड़ाई लड़ेगी। पार्टी का निशान तीर धनुष और प्रतीक चिन्ह टाइगर बनाया गया।

शिवसेना के गठन के बाद बाल ठाकरे ने सबसे पहले मराठा अभिमान की राग छेड़कर और उसके बाद हिंदुत्व रक्षक बनकर शिवसेना को शक्तिशाली बनाया। उसके बाद अपने ही समान विचारधारा पर बनी भारतीय जनता पार्टी से हाथ मिलाकर अपने राजनीतिक करियर को मज़बूती दी।

1971 के लोकसभा चुनाव में पहली बार शिवसेना चुनावी मैदान में उतरी। पांच सीटों पर प्रत्याशी खड़े किए जिसमें से एक पर भी जीत का खाता नहीं खोल सकी। उसके बाद 80 के लोकसभा चुनाव में पहली बार एक सीट जीतने में कामयाब हो सकी। जिसके बाद लगातार कामयाबी का सफर तय करते हुए इस मुकाम तक पहुंची कि 2019 के लोकसभा चुनाव में 18 लोकसभा सीटों पर जीत मिली। भाजपा के गठबंधन के साथ इस चुनाव में खड़ी हुई शिवसेना और भाजपा को मिलाकर 41 सीटें मिलीं।

क्या उद्धव ठाकरे शिवसेना को बचा पाएंगे ?

विधानसभा चुनाव की बात करें तो 1996 में शिवसेना ने 132 सीटों पर प्रत्याशी उतारे जिसमें से केवल 15 पर ही जीत मिल सकी। उसके बाद लगातार विधानसभा चुनाव में जीती गईं सीटें बढ़ती चली गईं और हारने वाली सीटें कम होती गईं और आखिरकार 2019 में बाला साहेब ठाकरे के पुत्र उद्धव ठाकरे एनसीपी के साथ गठबंधन कर सीएम की कुर्सी तक पहुंचने में कामयाब हो गए।

ढाई साल बाद अब जो कुछ हुआ वह आपके सामने है। और शिवसेना की नींव पड़ने के बाद से लगातार 5 दशकों में शिवसेना के लिए यह सबसे मुश्किल घड़ी है। पार्टी की इमेज, पॉवर और भरोसा सबकुछ दांव पर लगा हुआ है। बाल ठाकरे के बाद शिवसेना की बागडोर संभालने वाले उद्धव ठाकरे सीएम आवास वर्षा से वापस मातोश्री आ चुके हैं और अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि वह बिखरती हुई शिवसेना को बचा पाएंगे या नहीं?

वरिष्ठ पत्रकार सहीफ़ा खान, कानपुर

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